Al-Ma'arij المعارج
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“Leave Me” and “be patient”: the messenger facing denial (68, then 69-77)
Read the section from its beginning: sura 68
What was shown before: “Leave Me” and “be patient” come from 68. 68
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
ईश्वर के नाम से, जो सर्वदयालु, दयालु है।
एक माँगने वाले ने एक ऐसा दंड माँगा जो आने वाला है, नकारने वालों के लिए — कोई उसे हटाने वाला नहीं — ईश्वर की ओर से, जो चढ़ने के मार्गों वाला है।
سَأَلَ سَآئِلٌۢ بِعَذَابٍۢ وَاقِعٍۢ لِّلْكَٰفِرِينَ لَيْسَ لَهُۥ دَافِعٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ ذِى ٱلْمَعَارِجِ
अभिकर्ता और प्रवाह उसकी ओर एक ऐसे दिन में चढ़ते हैं जिसकी माप पचास हज़ार वर्ष है।
تَعْرُجُ ٱلْمَلَٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍۢ كَانَ مِقْدَارُهُۥ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍۢ
तो गरिमापूर्ण धैर्य से धैर्य रखो,
فَٱصْبِرْ صَبْرًۭا جَمِيلًا
क्योंकि वे उसे दूर देखते हैं, जबकि हम उसे निकट देखते हैं।
إِنَّهُمْ يَرَوْنَهُۥ بَعِيدًۭا وَنَرَىٰهُ قَرِيبًۭا
जिस दिन आकाश पिघली धातु जैसा होगा, पहाड़ ऊन जैसे होंगे, और कोई गर्मजोशी वाला मित्र किसी गर्मजोशी वाले मित्र से नहीं पूछेगा, जबकि उन्हें एक-दूसरे को स्पष्ट दिखाया जाएगा।
يَوْمَ تَكُونُ ٱلسَّمَآءُ كَٱلْمُهْلِ وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ وَلَا يَسْـَٔلُ حَمِيمٌ حَمِيمًۭا يُبَصَّرُونَهُمْ
बहिष्कृत चाहेगा कि उस दिन के दंड से स्वयं को अपने पुत्रों, अपनी संगिनी, अपने भाई, अपने उस वंश जो उसे शरण देता था, और उन सबके बदले छुड़ा ले जो धरती पर हैं, यदि वह तब उसे उबार सके। कदापि नहीं!
يَوَدُّ ٱلْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِى مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍۭ بِبَنِيهِ وَصَٰحِبَتِهِۦ وَأَخِيهِ وَفَصِيلَتِهِ ٱلَّتِى تُـْٔوِيهِ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا ثُمَّ يُنجِيهِ كَلَّآ
वह निश्चय ही लपकती ज्वाला है, खोपड़ी की खाल उधेड़ने वाली, जो उसे पुकारती है जिसने पीठ फेरी और मुँह मोड़ा, जिसने जोड़ा और फिर बंद करके रखा।
إِنَّهَا لَظَىٰ نَزَّاعَةًۭ لِّلشَّوَىٰ تَدْعُوا۟ مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّىٰ وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰٓ
मनुष्य निश्चय ही बेचैन रचा गया है: जब उसे बुराई छूती है तो वह घबरा उठता है, और जब उसे अच्छाई छूती है तो वह उसे दूसरों से रोक लेता है — सिवा उनके जो संपर्क जोड़ते हैं, अपने संपर्क में नियमित,
إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ خُلِقَ هَلُوعًا إِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ جَزُوعًۭا وَإِذَا مَسَّهُ ٱلْخَيْرُ مَنُوعًا إِلَّا ٱلْمُصَلِّينَ ٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ دَآئِمُونَ
और जिनकी संपत्ति में माँगने वाले और वंचित के लिए एक ज्ञात हक़ है,
وَٱلَّذِينَ فِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّۭ مَّعْلُومٌۭ لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ
और जो चुकौती के दिन को सच्चा ठहराते हैं,
وَٱلَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ
और जो अपने अभिभावक के दंड से आशंका से भरे हैं — क्योंकि उनके अभिभावक के दंड से कोई सुरक्षित नहीं —
وَٱلَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍۢ
और जो अपनी शुचिता की रक्षा करते हैं, सिवा अपने जोड़ीदारों या शपथ से बँधों के प्रति — तब वे दोषारोपित नहीं हैं;
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَٰفِظُونَ إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
जो कोई इससे परे खोजता है, वही हैं जो सीमाएँ पार करते हैं;
فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ
और जो अपनी धरोहरों और अपनी संधि के प्रति सजग हैं,
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَٰنَٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ
और जो अपने साक्ष्य बनाए रखते हैं,
وَٱلَّذِينَ هُم بِشَهَٰدَٰتِهِمْ قَآئِمُونَ
और जो अपने संपर्क की निरंतर रक्षा करते हैं: वही उद्यानों में सम्मानित किए जाएँगे।
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ أُو۟لَٰٓئِكَ فِى جَنَّٰتٍۢ مُّكْرَمُونَ
नकारने वालों को क्या हुआ है कि वे तुम्हारी ओर दौड़े आ रहे हैं, तुम्हारे दाएँ और बाएँ, अलग-अलग टोलियों में?
فَمَالِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ عَنِ ٱلْيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ عِزِينَ
क्या उनमें से हर व्यक्ति उपकार के उद्यान में प्रवेश पाने की लालसा रखता है? कदापि नहीं!
أَيَطْمَعُ كُلُّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍۢ كَلَّآ
हमने उन्हें निश्चय ही उससे रचा है जिसे वे जानते हैं।
إِنَّا خَلَقْنَٰهُم مِّمَّا يَعْلَمُونَ
नहीं! मैं उदय-स्थलों और अस्त-स्थलों के अभिभावक की शपथ लेता हूँ कि हम अवश्य उन्हें उनसे बेहतरों से बदलने में सामर्थ्यवान हैं, और कोई चीज़ हमसे आगे नहीं निकल सकती।
فَلَآ أُقْسِمُ بِرَبِّ ٱلْمَشَٰرِقِ وَٱلْمَغَٰرِبِ إِنَّا لَقَٰدِرُونَ عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ خَيْرًۭا مِّنْهُمْ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
तो उन्हें त्याग दो: वे डूबे रहें और खेलते रहें, जब तक वे अपने उस दिन से न मिलें जिसका उनसे वादा किया गया है — वह दिन जब वे क़ब्रों से तेज़ी से निकलेंगे, मानो वे किसी खड़े किए गए शिला-स्तंभ की ओर दौड़ रहे हों, उनकी दृष्टियाँ विनीत, अपमान उन्हें ढकता हुआ।
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا۟ وَيَلْعَبُوا۟ حَتَّىٰ يُلَٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ سِرَاعًۭا كَأَنَّهُمْ إِلَىٰ نُصُبٍۢ يُوفِضُونَ خَٰشِعَةً أَبْصَٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۭ
यही तो वह दिन है जिसका उनसे वादा किया गया था।
ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يُوعَدُونَ