Al-Fajr الفجر
The dawn and the reassured Self الفجر والنفس المطمئنّة
Summary and links in the frieze
In the frieze Blessed or restricted, he learns the test is honoring the orphan and feeding the destitute, before the Day.
Read just before, 90 leads here: Feeding the orphan and the destitute is plunging past; the next sura reproaches: you do not honor the orphan, nor urge feeding the destitute. 90
It leads to 88: Jahannam brought and the Self entering the Garden; the next sura shows these two outcomes as two groups of faces. 88
Closes on “They ask one another”
ईश्वर के नाम से, जो सर्वदयालु, दयालु है। भोर की शपथ! दस रातों की! मध्यस्थता की, और वंचना की! रात की जब वह बीतती है! क्या इसमें उसके लिए शपथ नहीं जिसके पास अंकुश है?
بِسۡمِ اِ۬للَّهِ اِ۬لرَّحۡمَٰنِ اِ۬لرَّحِيمِ وَاَلۡفَجۡرِ وَلَيَالٍ عَشۡرٖ وَاَلشَّفۡعِ وَاَلۡوَتۡرِ وَاَلَّيۡلِ إِذَا يَسۡرِۦ هَلۡ فِي ذَٰلِك قَّسَمٞ لِّذِي حِجۡرٍ
क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे अभिभावक ने आद के साथ कैसा व्यवहार किया, स्तंभों वाले इरम के साथ, जिसके जैसा देशों में कभी रचा नहीं गया था? और समूद के साथ जो घाटी में चट्टान तराशते थे? और फ़िरऔन के साथ, खूँटों वाले मनुष्य के साथ? वे जो देशों में हर मर्यादा से आगे निकल गए थे, और जिन्होंने उनमें बिगाड़ बहुत फैलाया था। तो तुम्हारे अभिभावक ने उन पर दंड का कोड़ा उँडेल दिया।
أَلَمۡ تَرَ كَيۡف فَّعَل رَّبُّكَ بِعَادٍ إِرَمَ ذَاتِ اِ۬لۡعِمَادِ اِ۬لَّتِي لَمۡ يُخۡلَقۡ مِثۡلُهَا فِي اِ۬لۡبِلَٰدِ وَثَمُودَ اَ۬لَّذِينَ جَابُواْ اُ۬لصَّخۡرَ بِالۡوَادِ وَفِرۡعَوۡنَ ذِي اِ۬لۡأَوۡتَادِ اِ۬لَّذِينَ طَغَوۡاْ فِي اِ۬لۡبِلَٰدِ فَأَكۡثَرُواْ فِيهَا اَ۬لۡفَسَادَ فَصَبَّ عَلَيۡهِمۡ رَبُّكَ سَوۡطَ عَذَابٍ
तुम्हारा अभिभावक अवश्य सदा घात में रहता है।
إِنَّ رَبَّكَ لَبِالۡمِرۡصَادِ
रहा मनुष्य, जब उसका अभिभावक उसे सम्मान देकर और उपकारों से भरकर परखता है, तो वह कहता है: “मेरे अभिभावक ने मुझे सम्मानित किया।”
فَأَمَّا اَ۬لۡإِنسَٰنُ إِذَا مَا اَ۪بۡتَلَىٰهُ رَبُّهُۥ فَأَكۡرَمَهُۥ وَنَعَّمَهُۥ فَيَقُول رَّبِّيَ أَكۡرَمَنِۦ
परंतु जब वह उसकी जीविका नापकर उसे परखता है, तो वह कहता है: “मेरे अभिभावक ने मुझे अपमानित किया।” कदापि नहीं!
وَأَمَّا إِذَا مَا اَ۪بۡتَلَىٰهُ فَقَدَرَ عَلَيۡهِ رِزۡقَهُۥ فَيَقُول رَّبِّيَ أَهَٰنَنِۦ كَلَّاۖ
बल्कि तुम अनाथ का सम्मान नहीं करते, और दरिद्र को खिलाने के लिए प्रेरित नहीं करते, और तुम विरासत को क्रूर लालसा से खा जाते हो, और संपत्ति से अतिशय प्रेम करते हो। कदापि नहीं!
بَل لَّا يُكۡرِمُونَ اَ۬لۡيَتِيمَ وَلَا يَحُضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ اِ۬لۡمِسۡكِينِ وَيَاكُلُونَ اَ۬لتُّرَاثَ أَكۡلٗا لَّمّٗا وَيُحِبُّونَ اَ۬لۡمَالَ حُبّٗا جَمّٗا كَلَّاۖ
जब धरती कूट-कूटकर समतल कर दी जाएगी, और तुम्हारा अभिभावक आएगा, और अभिकर्ता भी, पंक्ति-पंक्ति, और उस दिन जहन्नम लाई जाएगी... उस दिन मनुष्य स्मरण करेगा। परंतु उस स्मरण से उसे क्या लाभ?
إِذَا دُكَّتِ اِ۬لۡأَرۡضُ دَكّٗا دَكّٗا وَجَآءَ رَبُّكَ وَاَلۡمَلَكُ صَفّٗا صَفّٗا وَجِاْيٓءَ يَوۡمَئِذِۢ بِجَهَنَّمَ يَوۡمَئِذٖ يَتَذَكَّرُ اُ۬لۡإِنسَٰنُ وَأَنَّىٰ لَهُ اُ۬لذِّكۡر۪يٰ
वह कहेगा: “अफ़सोस! काश मैंने अपने जीवन के लिए आगे बढ़ाया होता!”
يَقُولُ يَٰلَيۡتَنِي قَدَّمۡتُ لِحَيَاتِي
उस दिन कोई उसके दंड जैसा दंडित नहीं किया जाएगा, और कोई उसके बंधन जैसा बाँधा नहीं जाएगा।
فَيَوۡمَئِذٖ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُۥ أَحَدٞ وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُۥ أَحَدٞ
हे निश्चिंतता में रहने वाले स्व! अपने अभिभावक की ओर लौटो, संतुष्ट और स्वीकृत होकर। तो मेरे आज्ञाकारियों में प्रवेश करो, और मेरे उद्यान में प्रवेश करो!
يَٰأَيَّتُهَا اَ۬لنَّفۡسُ اُ۬لۡمُطۡمَئِنَّةُ اُ۪رۡجِعِي إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةٗ مَّرۡضِيَّةٗ فَاَدۡخُلِي فِي عِبَٰدِي وَاَدۡخُلِي جَنَّتِي